Mera favourite festival- Shivani deshwal

नमस्कार दोस्तों 

          


  आज सुबह ही मैने पतिदेव को याद दिलाया की करवा चौथ आ रही है इस बार क्या दिलाओगे तो उन्होने बोला कुच नही केवल मेरी तरफ देखा और अपना काम करने लगे।सोचा जाये तो इस खामोशी के कई अर्थ रहे होंगे,जैसे की तुमको जब देखो खर्चों की पड़ी रहती है या अभी 7वा वेतन आयोग तक लगायी नही है हाई कोर्ट,आदेश कब से हुआ रखा है,या फिर ये भी कि सुबह सुबह दिमाग का दही मत करो जाओ अपना भी काम करो और मुझे भी करने दो😁 पर मैं भी ठहरी शिवानी इसलिये बिना ज्यादा वक्त गँवाए मैंने अपने मतलब का अर्थ निकाल लिया कि अरे यार क्या बात करती हो सब तुम्हारा ही तो है जो चाहे ले लो😁😁

               देखिए भई ये सच भी है कि आखिर है तो सब हमारा ही आखिर पति बेचारे खर्च ही कहाँ करते है? पर खर्च तो बिना बताये हम भी नही करते।अब देखिए हो चाहे जो भी पर शान्ति बड़ी है इस बात में। करवा चौथ मेरे पसंदीदा त्यौहारों में से एक है, मतलब वो भी कारण सही है कि भई खूब खर्च करवाते हैं उसके अलावा भी कई कारण हैं।कारण है उस दिन मुझमें एक अलग ही एनर्जी रहती है,अलग ही उत्साह।

               वैसे मे व्रत ज्यादा रख नही पाती मेरा ब्लड प्रेशर लो हो जाता है बिना नमक खाए,और पतिदेव का लेक्चर चालू हो जाता है कि कितनी बार मना किया है मैंने तुम्हे कि मत रहा करो खाली पेट ज्यादा देर। बात फिर भी मुझे इस त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। अब उन्हे कौन समझाए कि उनके लिए ये व्रत रख के मुझे कितनी खुशी मिलती है।

            मैंने यें बात अपनी सासू माँ से सीखी है कि सारा घर परिवार, नाते रिश्तेदार एक तरफ यहाँ तक के अपने खुद के बच्चे भी बाद में पर पति हमेशा पहले। सभी मे कुछ ना कुछ अच्छा तो होता ही है ना बस देखना ये होता है कि आप उनसे सीखते क्या हो। करवा चौथ मैंने पहली बार ससुराल में ही देखा चूंकि मेरे मायके में मम्मी नही रखती ये वृत तो घर में किसी को देखा ही नही। कई दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। नयी साड़ी लाना, मेहंदी लगवाना ये सब करते हुए बड़ा मज़ा आता है।

            उस दिन सुबह से उठते ही बड़ी अच्छी सी फीलिंग होती है। हमारे यहाँ दोपहर में ही कहानी सुन लेते हैं। सब कालोनी की महिलाये एक जगह इकट्ठी होती है और सब तैयार हो होकर आकर एक जगह बैठ जाती हैं, उनमें से जो सबसे बुजुर्ग महिला होंगी वो सबको कहानी सुनायेंगी, कहानी सुनकर सब सूर्य को अर्घ देती है,जी हाँ हमारे यहाँ सूर्य और चंद्रमा दोनो को अर्घ दिया जाता है। फिर सब अपनी बड़ी महिलाओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेती है और अपने घर जाकर शाम की तैयारी करती हैं। 

               तरह-तरह के पकवान बनते हैं और शाम को एक बार फिर तैयार होकर हम सब छत पर जाकर चंद्रमा का इंतज़ार करते हैं। उस दिन तो चांद जान बूझ कर देर से निकलता है। भूख की वज़ह से हालत खराब होती रहती है ऊपर से या तो कभी घटा या फिर बारिश के कारण भी चांद दिखायी नही देता।एक बार तो मेरे साथ ये हुआ कि मैं अपने मायके मे थी और 10बज गये मुझे इंतज़ार करते करते चांद का। फिर पतिदेव ने वीडियो काॅल करके दर्शन कराये तब जाके कही मेने खाना खाया।

      कुछ भी हो ये दिन भी अपने आप मे बड़ा ही मजेदार होता है। छोटी मोटी नोक झोंक तो जीवन भर लगी ही रहती है और होनी भी चाहिये कयूकि इसी तरह तो जीने का आनंद आता है।


शिवानी देशवाल

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