Bachpan ki yaadein - shivani deshwal
नमस्कार दोस्तो
सबलगढ़ में ज्यादातर महिलाएं साड़ी पहनती हैं, साड़ी ही उनका रोज का पहनावा है, जब भी मंदिर जाती हूँ तो कीर्तन होते होते रहते है मंदिर में, वह बोहोत सारी महिलाये कीर्तन करती है, अच्छा भी लगता है, हालाकि में वह जयादा देर रुक नहीं पाती, वापस आ जाती हूँ पर जाने अनजाने मन वही छोड़ आती हु, वही ढोलक की थाप, ताली बजाते हाथ घर वापस आने के बाद भी कानो में गूंजते रहते है, असली तीज त्योहर या संस्कृति छोटे शहरों में अभी भी जिन्दा है किसी न किसी रूप में, बड़े शहरों में तो बस दिखावा ही रह गया है।
में छोटी थी तो मम्मी को अक्सर सुन्दर सुन्दर साड़ी पहने हुए देखा करती थी।तब हम तीनो भाई बहन छोटे हुआ करते थे, मम्मी सुन्दर बोहोत लगती थी साड़ी पहने हुए, तब हम उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के सिम्भावली नाम के कस्बे में रहते थे, पापा वहाँ चीनी मिल में नौकरी करते थे (उ.पृ. में बोहोत बड़ी संख्या में चीनी मिले हैं) छोटी जगह थी , ज्यादातर सभी एक दूसरे को जानते थे, मंदिर जाना हो, किसी के घर ,हम तीनो भाई बहन वही पैदा हुए, बोहोत मज़ा आता था , सब लोग बोहोत प्यार करते थे, कही हमे कोई बाहर खेलते देख लेता आते जाते तो तुरंत डाट कर घर भेज देता या जेक मम्मी से शिकायत कर देता, तब में 8 -9 साल की रही होउंगी शायद फिर भी मुझे गुस्सा आता था की बताओ अब तो हम बड़े हो गए है फिर भी हमारी कोई आज़ादी नहीं है, कही खेल भी नहीं सकते, देख भजन कीर्तन हो या कोई ख़ास समारोह सब मिलकर मनाते थे।
मम्मी सर्दियों की धुप में छत पर आस पास की आंटीयो के साथ मिलकर स्वेटर बुनती थी, और सबसे मजे की बात तो ये है की ज्यादातर आंटियो क स्वेटर क डिज़ाइन एक जैसे होते थे फिर आपस में तय करती थी की तुम इस बुनाई को सीधा डाल दो मै तिरछा दाल देती हूँ।
एक बार तो हद्द तब हो गयी जब मेरी क्लास में पढ़ने वाला एक लड़का अपने घर जा रहा तह औअर मम्मी ने उसको आवाज़ देकर उसके स्वेटर का डिज़ाइन देखा था मुझे बोहोत शर्म आयी थी चुकी उस वक़्त में क्लास 7 में थी (और अपने भाई क आने का बाद कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गयी थी एकदम से) उस वक़्त की ये क्या सोचेगा घर जेक अपनी मम्मी को बताएगा तो वो क्या सोचेंगी, अगले दिन पता चला उसकी मम्मी ने भी डिज़ाइन क लिए मेरा स्वेटर मँगवाया था, तब मुझ लगा था की इसका मतलब सारी मम्मिया एक सी होती हैं और बड़ी बात ये थी की मेरी माँ को उसका एड्रेस भी नहीं पता तब भी उस लड़के के हाथो मेरा स्वेटर भेज दिया था और वो भी मेरा पसंदीदा, उसकी मम्मी अच्छी थीं क्युकि उन्होने मेरा स्वेटर वापस भेज दिया था।वाह कितनी आपसी सामंजस्यता थी इन लोगो में आज सोचती हूँ तो हँसी आती है।
नीचे सड़क पर एक गोलगप्पे वाला खड़ा होता था, सब लोग हम बच्चो से दही से बताशे, टिक्की या गोलगप्पे मंगवाती थी, चुकी पूरी कॉलोनी की आंटी इकट्ठी होती थी तब ये इनकी पार्टी होती थी या ख़ुशी एक दूसरे क साथ होने की, इसका सबसे मजेदार पार्ट ये था की सबकी मम्मिया हम बच्चो को अपने हाथ से बताशे खिलाती थी और फिर हम एक दूसरे को कहकर चिढ़ाते थे की देखो मेरी मम्मी ने तो खिलाया मुझे, तुमको नहीं खिलाया क्या?
गर्मियों के दिनों में हम सारे बच्चे शाम को घर से बाहर निकल कर एक साथ खेलते थे, रोज इंतज़ार रहता था कि कब लाइट जाएगी और हम सब पिंजरे में बंद क़ैदी की तरह आज़ादी पाएंगे और फिर धमाल मचाएंगे। हमारे एक चौकीदार अंकल थे जो अपनी चारपाई पर हम सब बच्चों को बैठा लेते थे और फिर कहानियाँ सुनते थे। हम रोज़ उन कहानियो का इंतज़ार करते थे, कई बार तो कहानियाँ डरावनी होती तो हम सारे बच्चे एक दूसरे से चिपक चिपक कर कहानी सुनते कोई जो सबसे छोटा होता वो तो चौकीदार अंकल की गोदी में ही चढ़ के बैठ जाता।
फिर अंकल कहते अरे तुम लोग डरते हो तो कहते क्यों हो? अब ये तो कोई बात नहीं हुई, मेरी दो सहेलिया पास के ही गांव से आती थी अंकल पापा क बोहोत अच्छे दोस्त थे और हमारा रिश्ता दोस्ती से कही ज्यादा परिवार का था, वैसे तो हम सब छुट्टियों में उनके घर जाते ही थे, पर में तो ऐसे भी शनिवार को उनके साथ चली जाती थी(मम्मी से पूछ के ही जाती थी) और फिर सोमवार को वही से स्कूल वापस चली जाती थी। उनका घर काफी खुला खुला था और खास पार्ट था जो की मेरा फेवरेट था की मुझे उसके कपडे पहनने को मिलते थे। और वो चिढ्ती थी बड़ा मज़ा आता सच मे।
चीनी मिल के पीछे रेलवे लाईन पड़ती थी चुकी ये मिल अंग्रेजो के टाईम की थी और जो भी मिले पुरानी होती हैं उनमें सीधे माल गाड़ी से अन्दर गन्ना लेकर जाया जाता है, आज भी ऐसा ही है,इसलिये पहली बात तो चीनी मिल सिटी से बाहर होती हैं,दूसरा वहा अपना रेलवे स्टेशन जरुर होता है और डेवलपमेंट भी जल्दी हो जाता है,
फिर पापा का वहा से स्थानांतरण हो गया और हम सिम्भावली से चले गये चिल्वरिया चीनी मिल जो की जिला बहराइच मे पडती है और सिंभावली चीनी की ही सब यूनिट है, कभी लौट के वह नहीं गए एक बार भी। चीजें खुद ही बदलती चली गई,हमे ती पता भी नहीं चला कब हम आगे बढते और लोग पीछे छूट ते चले गये।मम्मी ने साड़ी रोज़ की जगह ओकेजलनी पहननी शुरू कर दी। अब तो कई साल बीत गये उन्हे ढंग से तैयार हुए देखे हुए।
मेरा अपना छोटा सा शहर पीछे छूट गया ।जहां हमारा जन्म हुआ।मेरे स्कूल की प्रिंसिपल मैडम मेरे पापा को भाई मानती थी और राखी बान्धती थी, इसका कोई फायदा न्ही था हमे उल्टा नुक्सान ही था क्युकी हमारी हर छोटी से छोटी शैतानी की शिकायत घर पोहोच जाती।
आज भी मुझे वो शहर याद आता है,वहाँ के लोग(जिनमे से कुच लोग तो अब शायद जीवित भी ना हो)रीति रिवाज़,तीज त्यौहार याद आते हैं।अपनी सहेलिया याद आती हैं।अब तो सब अपनी जिन्दगी मे सेटल हैं। उतना अपनापन फिर कही मिला ही नही,सबसे बड़ी बात वहाँ मेरा भाई पैदा हुआ था।
वो लोग वो शहर वो गलियाँ याद आती हैं,
मुझे बिछड़ी हुई सहेलिया याद आती है।


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