माँ-शिवानी देशवाल
उसकी नर्म हथेलियों में जब अपना हाथ रखा तो वो गर्माहट अनजाने ही कितना कुछ कह गई। कह गई कि हां मैं हूँ मैं हूँ तुम्हारा हाथ थामे रहने के लिए हमेशा कभी भी किसी भी परिस्थिति में इसलिए तू थकना मत, रूकना मत, हारना नही क्युकि मैं हूँ तुम्हारी माँ।
माँ एक ऐसा शब्द है जिसका ना कोई आरंभ ना ही कोई अंत है, एक ऐसा रूप है जिसकी तुलना आप किसी और रिश्ते के साथ नही कर सकते। माँ के गर्भ में आने से पहले ही हमारा उससे रिश्ता जुड़ जाता है, पहले बोहोत पहले ठीक तब से जब से वो हमारे बारे में सोचना शुरू करती है। हां तब तो किसी को इस बात की परवाह भी नही होती कि वो छुप छुपकर कौन से सपने बुन रही है।और गर्भ में आने के बाद से शुरूआत होती है उन सपनो को सच करने की उन्हे सार्थक बनाने की। और बस यहीं से शुरूआत होती है माँ और बच्चे की पहली दोस्ती की जब से वो बिना बताये ये जानना शुरू करती है कि मेरे बच्चे को क्या खाना है? जिन्हे mood swings ya craving का नाम देते हैं वो असल में शुरूआत होती है उस दोस्ती उस रिश्ते की जिसमें बिना किसी वादे के सभी वादे निभाये जाते हैं। इसलिए मेरे अनुसार बच्चे की पहली पाठशाला गर्भ है और पहली गुरु माँ।
माँ वो हर दर्द बर्दाश्त करती है जो उसकी संतान को सुरक्षित और काबिल बनाती है। वो माँ ही होती है जो अपनी संतान के मन के हर भाव को भांप लेती है खुशी हो दुख हो या उदासी और बस ये भाव पल भर में उसके अपने हो जाते हैं। वो माँ ही होती है जो घर में भिंडी की सब्जी बनने के नाम पर नाक मुँह सिकोडने वाले बच्चो के पास जाकर हथेली में रोटी और उस पर भिंडी रखकर बैठ जाए और निवाला बनाकर बिनाखुद चखे ही तुम्हे बुलाये कि अरे एक बार खाकर तो देखो कितनी स्वाद बनी है। और फिर एक एक निवाला बनाकर अपनें हाथ से तुम्हे सारा खाना खिला दे।वाकई आज तक समझ नही आया कि उस बेस्वाद सी दिखने वाली सब्जी में अचानक इतना स्वाद आ कहाँ से जाता है ।
माँ वो है जो हमारी ठुडडी पकड़कर हमारे बालों में कंघी करती है और बालों मे रोज़ तेल लगाते हुए रोज़ कहती है कि देखो बाल कितने रूखे हो गये हैं बिल्कुल ध्यान नही रखती हो अपना मैं कब तक करूंगी ये सब?
पता है लोगों को लगता है कि माँ बेटों के ज्यादा करीब होतीं हैं, हो भी सकता है। पर मेरा मानना है कि बेटियां माँ को ज्यादा करीब मानती हैं, खासकर शादी के के बाद से जब एहसास होता है कि माँ ये बात क्यू समझाती थी और उससे भी ज्यादा जब वो खुद माँ बनती है और वो भी बेटी की क्युकि अब वो वही जिंदगी जीती है अपनी बेटी के साथ जो उसकी माँ जीती थी उसके साथ। जैसै माँ अपना बचपन अपनी बेटी में ढूंढती है वैसे ही बेटी भी अपनी सबसे अच्छी सहेली अपनी माँ में ढूंढती है तभी तो अपने घर परिवार की हर बात हर मुश्किल विश्वास के साथ अपनी माँ को बताती है कि हो ना हो मेरी माँ हर समस्या का हल निकाल ही लेगी।
बेटियों को माँ की परछाई कहा जाता है इसीलिए तो पहले जमाने में रिश्ता पक्का करने के लिए माँ को देखकर ही अंदाज लगा लिया जाता था कि बेटी सभ्य है या असभ्य। आज ही बेटी माँ की साड़ी पहनकर पूछती है लग रही हूँ ना बिलकुल माँ जैसी। ये तो वो प्रोग्राम है जो स्वतः ही हमारे शरीर में फिट है तभी तो चोट शरीर के किसी भी अंग में लगे मुंह से माँ अनायास ही निकल पड़ता है।
पर आज बदलते जमाने के साथ वो सहेली कुछ बदल गई है। कहीं खो गई है इस भीड़ में लाख ढूँढने पर भी नही मिलती। इसीलिए शायद अब बेटी के पसीने से भीगे चेहरे को अपने पल्लू से भी नही पोंछती। तभी तो लाख आह भरने पर भी उसे सुनाई नही देतीं
कोई बताइयेगा कहाँ गई वो पुराने वाली माँ।



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें