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Meri beti ne jo mujhe sikhaya- shivani deshwal

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 Hello Dosto कुछ दिन पहले की बात है मेरी बेटी इशिता और मैं कुछ लिखने का काम कर रहे थे मेरी बेटी ने मुझसे कहा की मम्मा आप पेन का कैप लगाकर काम करो उससे कैप खोयेगा नही चूँकि मैं हमेशा से ऐसे ही काम करती आई हूँ कैप साइड में रख कर क्युकी मुझे पेन पर कैप लगाने से पेन भारी महसूस होता है, मेने मना कर दिया तो तुरन्त ही मेरी बेटी ने भी पेन का कैप उतार दिया।मेने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा आपने नही लगाया तो मुझे लगा कुछ तो कारण होगा बस इसीलिए मेने भी उतार दिया।              बात पढ़ने और सुनने मे छोटी हो सकती है पर उस रोज़ मेने जो देखा और समझा वो छोटा नही था।मेरी बेटी इशिता 10 वर्ष की हो जायेगी 2 महीने बाद और मैं ये महसूस कर रही हूँ कुछ दिनो से कि वो मुझे काफी follow करने लगी है। ये बोहोत सुखद एहसास है क्युकी मैं हमेशा चाहती थी कि मेरी बेटी मेरी परछाई बने और वो हुआ भी है, पर साथ ही एक डर है एक बात है जो मेरे दिल और दिमाग दोनो पर छा गया है कि बच्चे वही सीखते हैं और वही अनुसरण करते हैं जो उनके माता पिता करते हैं तो क्या माता पिता को अपने तौर तरीकों पर ज्याद...

माँ-शिवानी देशवाल

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 उसकी नर्म हथेलियों में जब अपना हाथ रखा तो वो गर्माहट अनजाने ही कितना कुछ कह गई। कह गई  कि हां मैं हूँ  मैं हूँ तुम्हारा हाथ थामे रहने के लिए हमेशा कभी भी किसी भी परिस्थिति में इसलिए तू थकना मत, रूकना मत, हारना नही क्युकि मैं हूँ तुम्हारी माँ।                माँ एक ऐसा शब्द है जिसका ना कोई आरंभ ना ही कोई अंत है, एक ऐसा रूप है जिसकी तुलना आप किसी और रिश्ते के साथ नही कर सकते। माँ के गर्भ में आने से पहले ही हमारा उससे रिश्ता जुड़ जाता है, पहले बोहोत पहले ठीक तब से जब से वो हमारे बारे में सोचना शुरू करती है। हां तब तो किसी को इस बात की परवाह भी नही होती कि वो छुप छुपकर कौन से सपने बुन रही है।और गर्भ में आने के बाद से शुरूआत होती है उन सपनो को सच करने की उन्हे सार्थक बनाने की। और बस यहीं से शुरूआत होती है माँ और बच्चे की पहली दोस्ती की जब से वो बिना बताये ये जानना शुरू करती है कि मेरे बच्चे को क्या खाना है? जिन्हे mood swings ya craving का नाम देते हैं वो असल में शुरूआत होती है उस दोस्ती उस रिश्ते की जिसमें बिना किसी वादे के सभी वादे नि...

क्या दुःख से निकलना इतना आसान है? -Shivani Deshwal

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किसी को खो देने का दुख क्या होता है ये मुझसे पूछो मैने बोहोत करीब से इसे देखा है महसूस किया है। किसी बोहोत अपने को जो आपके दिल के बोहोत करीब हो और जिसकी आपने सपने में भी कल्पना ना की हो वही इन्सान अगर आपको हमेशा के लिए छोड़ कर चला जाए तो क्या होता है ये मुझसे बेहतर कौन बता सकता है।मेने तो इस दुख को जिया है बोहोत करीब से। मुझे समझना उन लोगों के लिये थोड़ा मुश्किल होगा जो समझना नही चाहते पर वो लोग आसानी से समझ जाएँगे जिन्होने मेरी तरह किसी भी अपने को हाल फिल्हाल खोया है।                किसी के चले जाने मात्र से दुनिया नही रुकती यही प्रकृति का नियम है यही सच है। ये तो हम सब जानते ही हैं यहाँ तक के जब आप उन परिस्थतियों का सामना कर रहे होते हैं तब सभी ज्ञानी लोग हमे यही समझाते हैं इसी तरह पर हमारा मन सब जानते हुए भी उस दुख को सहने की शक्ति नही जुटा पाता। जुटाये भी कहाँ से ये दुख अचानक से इस तरह से हमारे ऊपर गिरते हैं की कितना ही समझदार इन्सान हो सब समझदारी धरी रह जाती है। जमीनी हकीकत यही है।कोई कुच भी कितना भी कहे पर मन तो मन है करेगा वही जो वो खुद चाहेग...

आगे बढ़ना जरुरी है पर अपनो के साथ

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 कितनी ही बार हम सफलता के पीछे भाग भागकर इतने असफल हो जाते हैं कि हमें खुद पता नही चलता की क्या पाने के लिए घर से निकले थे और क्या क्या खोकर लौटें हैं। ऐसा होता है और सच भी है। आगे बढ़ना कई बार हमारी मजबूरी से ज्यादा जरुरत बन जाता है और हम सफलता के पीछे भागते रहते हैं बिना पीछे मुड़कर देखे हुए या ये सोचते हुए कि कोई बोहोत अपना कोई खास मित्र कहीं चाय की दुकान पर खड़ा आज भी मेरा इंतज़ार कर रहा होगा और मुझे घर जाने से पहले उससे मिलकर उसके साथ मन ना होते हुए भी एक ग्लास चाय पीकर तो जाना ही है।               सफल होने की दौड़ में जिस तरह से असफलताएँ पीछे छूट जाती है ठीक इसी प्रकार और भी बोहोत कुछ पीछे छूट जाता है। नये साथी मिलते हैं तो पुराने दोस्त छूट जाते हैं, नयी गाड़ी मिलती है तो पुरानी जान से भी ज्यादा जिसकी रक्षा करते थे, जिस पर गर्लफ्रेंड को बिठाकर शान से घूमते थे वो बाईक कहिं पीछे बोहोत पीछे छूट जाती है। बाॅस मिलते हैं तो माँ बाप पीछे छूट जाते हैं।              हमारी वो सुकून की नींद जो स्कूल जाने से पहले आती थी या ...

हॉस्टल की यादें अच्छी कुछ बुरी-

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  मैं जब फ़र्स्ट डे हॉस्टल गई थी तो वो दिन काफी उदास था। हालाँकि ये मेरा सपना सच होने जैसा था क्युकी मैं हमेशा से सोचती थी कि मुझे हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करनी है, जो की वही दिन था, फिर भी मन उदास था। ये एक प्राइवेट हॉस्टल था क्युकी मेरे कॉलेज में हॉस्टल नही था। लखनऊ यूनिवर्सिटी के अंडर आता है इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज, वही से मेने बी ए सी (स्नातक) की है। कॉलेज के पास ही थोड़ी सी दूर बस वाकिंग दूरी पर ही हॉस्टल था मेरा।एक खूबसूरत सा घर नीचे आंटी यानी हमारी वॉर्डन रहती थी अपनी फेमिली के साथ और फर्स्ट फ्लोर पर हॉस्टल खोला था शुरुआत में। हालाँकि मेरे आने तक ऊपर दो फ्लोर और चालू हो गये थे और फुल भी थे।         मेरा मन नही लग रहा था जब पापा छोड़ कर जा रहे थे तो मन खराब हो रहा था। जबकि ऐसा नही था कि मैं पहली बार घर से निकली थी,आप कितना भी तजुर्बा रखते हों, कितने भी बड़े हो जाएँ पर अपने माता पिता का आपको छोड़ के जाना कभी भी खुशी नही दे सकता। मेरे अलावा उस दिन एक लड़की और थी हॉस्टल मे वो मुझसे शायद 2-3 दिन पहले आई थी। वो किसी और कॉलेज की थी और फ़ार्मेसी कर रही थी उसे भी घर की या...

महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की धुरी है- Shivani Deshwal

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महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की समान धुरी हैं। दोनो एक दूसरे के पूरक हैं, सबसे घनिष्ट मित्र भी और सबसे बेहतरीन और सच्चे साथी भी। जब हमारा जन्म ही एक दूसरे के लिये,एक दूसरे के साथ रहने के लिए हुआ है तो फिर हम रह क्यूँ नही पा रहे? क्या है जो हमें साथ रहने से रोकता है? क्या है जो हमें साथ आगे बढ़ने से रोकता है? हमारा अहं।           अगर अगर आप पति पत्नि हैं तो साथ गृहस्थी नही चला पा रहे, जल्दी ही तलाक ले लेते हैं या आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं और अब तो ये भी विचार नही रहा कि आपकी शादी को कितने साल हुए हैं? बच्चे हैं ? हैं तो कितने बड़े हैं? और कहिं आप गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड हैं मतलब शादी से पहले प्यार में हैं तो भी जल्दी ही अलग हो जाते हैं मतलब ब्रेकअप हो जाता है?   और कहीं लिव इन रिलेशनशिप मे हैं तो भी एक दूसरे को छोड़ कर कही और चले जाते हैं।बात तो थोड़ी अजीब है यहाँ तक के विचार करने योग्य है। पर ऐसा है क्यूँ? क्या हम जल्दी ही बोर हो जाते हैं इसलिए बदलाव महसूस करतें हैं या फिर हमें हमारे रिश्तों की कद्र नही रही या फिर जल्दी जल्दी बड़े होने और पैसे कमाने के चक्क...

एक घटना जिसने मुझे सीख दी- Shivani Deshwal

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बात सन 2002की है। मेरा इंटर का परिणाम आया और जाहिर सी बात है कि घर में चर्चा शुरु हो गई आगे की पढ़ाई को लेकर।कई लोगों से पूछ ताछ करने के बाद तय हुआ कि मैं स्नातक करूंगी पर कहाँ से? ये एक बड़ा प्रश्न था क्युकी पापा उस समय सीतापुर जिले के हरगाँव चीनी मिल्स में कार्यरत थे जो कि सीतापुर और लखीमपुर के बीच पड़ती थी तो निर्णय हुआ कि इन्ही मे से कहीं दाखिला लिया जाये।सब को ठीक ही लगा पर मुझे अच्छा नही लगा क्युकी मे इस से पहले यानी इंटर मे भी रोज़ अप डाउन कर चुकी थी जो कि थोड़ा मुश्किल भरा होता है।         ये वो चीजें होती हैं जिनसे आप रोज़ नया सीखते तो है पर कई बार कुछ मुश्किलें भी सामने आती हैं। अब अप देखिए कल आपका एक ही विषय पढ़ाया जायेगा, ये बात पहले से जानते हुए भी हमें जाना पड़ता ही था इतनी दूर। सारा दिन इसी में निकल जाता था। कई बार तो शाम हो जाती थी खासकर सर्दियों के दिनो में जब दिन छोटे होते हैं। घर आकर फिर सुबह जाने की तैयारी। इस बार मैं रोज़ आने जाने के लिए तैयार नही हुई। क्युकी कई बाते ऐसी होती हैं जो आप अपने माता पिता से उस समय पर नही बता सकते।       ...