कुदरत एक अनमोल खजाना- Social sandesh
आज सुबह 6.30 बजे जब मै बाहर गई अपने गार्डेन में तो मौसम बोहोत ही प्यारा लग रहा था,खुले आसमान की तरफ देखा तो कई महिनो बाद नीला रंग गजब ही लग रहा था। लगा मानो कुदरत महीनो से बारिश में नहाने के बाद निखर गई हो। बादल वापसी कर चुके हैं, जहा नही किये वहा से भी निकलने के लिये सामान बान्ध ही रहे होंगे। ज्यादा अच्छा तब लगा जब टहलते हुए कुछ मोर पंख मिल गये। हाँ मोर बोहोत हैं यहाँ।कुदरत के कितने करीब होने का एहसास अलग ही होता है, आप कितने भी थके हुए हो सारी थकान पल में छू हो जती है। तरह-तरह की चिडियाँ आती हैं रोज दाना चुगने। दाना मुह मे लेती हैं फिर या तो पेड़ पर बैठ जाती हैं या उनमे से कुछ अपने घोसले मे अपने बच्चों को देकर फिर लौट आती हैं। उन्हे देख कर मन करता है काश की मैं भी चिडिया होती, पंख फैलाये दौड़ जती असमान मे ऊपर बोहोत ऊपर और चुरा लाती आसमान का नीला रंग जो दूर ही दूर से आकर्षित करता रहता है अपनी ओर। कितनी खूबसूरती का खजाना छिपा है यहाँ, असमान का हल्का नीला रंग, पेड़ पौधों का हरा और मन का अलग खुबसूरत रंग जो है पर दिखाई नही देता। छिपा है बस अन्दर मन के भीतर। बड़ा अच्छा लगता है जब मोर पेड़ो...