माँ-शिवानी देशवाल
उसकी नर्म हथेलियों में जब अपना हाथ रखा तो वो गर्माहट अनजाने ही कितना कुछ कह गई। कह गई कि हां मैं हूँ मैं हूँ तुम्हारा हाथ थामे रहने के लिए हमेशा कभी भी किसी भी परिस्थिति में इसलिए तू थकना मत, रूकना मत, हारना नही क्युकि मैं हूँ तुम्हारी माँ। माँ एक ऐसा शब्द है जिसका ना कोई आरंभ ना ही कोई अंत है, एक ऐसा रूप है जिसकी तुलना आप किसी और रिश्ते के साथ नही कर सकते। माँ के गर्भ में आने से पहले ही हमारा उससे रिश्ता जुड़ जाता है, पहले बोहोत पहले ठीक तब से जब से वो हमारे बारे में सोचना शुरू करती है। हां तब तो किसी को इस बात की परवाह भी नही होती कि वो छुप छुपकर कौन से सपने बुन रही है।और गर्भ में आने के बाद से शुरूआत होती है उन सपनो को सच करने की उन्हे सार्थक बनाने की। और बस यहीं से शुरूआत होती है माँ और बच्चे की पहली दोस्ती की जब से वो बिना बताये ये जानना शुरू करती है कि मेरे बच्चे को क्या खाना है? जिन्हे mood swings ya craving का नाम देते हैं वो असल में शुरूआत होती है उस दोस्ती उस रिश्ते की जिसमें बिना किसी वादे के सभी वादे नि...