एक घटना जिसने मुझे सीख दी- Shivani Deshwal
बात सन 2002की है। मेरा इंटर का परिणाम आया और जाहिर सी बात है कि घर में चर्चा शुरु हो गई आगे की पढ़ाई को लेकर।कई लोगों से पूछ ताछ करने के बाद तय हुआ कि मैं स्नातक करूंगी पर कहाँ से? ये एक बड़ा प्रश्न था क्युकी पापा उस समय सीतापुर जिले के हरगाँव चीनी मिल्स में कार्यरत थे जो कि सीतापुर और लखीमपुर के बीच पड़ती थी तो निर्णय हुआ कि इन्ही मे से कहीं दाखिला लिया जाये।सब को ठीक ही लगा पर मुझे अच्छा नही लगा क्युकी मे इस से पहले यानी इंटर मे भी रोज़ अप डाउन कर चुकी थी जो कि थोड़ा मुश्किल भरा होता है।
ये वो चीजें होती हैं जिनसे आप रोज़ नया सीखते तो है पर कई बार कुछ मुश्किलें भी सामने आती हैं। अब अप देखिए कल आपका एक ही विषय पढ़ाया जायेगा, ये बात पहले से जानते हुए भी हमें जाना पड़ता ही था इतनी दूर। सारा दिन इसी में निकल जाता था। कई बार तो शाम हो जाती थी खासकर सर्दियों के दिनो में जब दिन छोटे होते हैं। घर आकर फिर सुबह जाने की तैयारी। इस बार मैं रोज़ आने जाने के लिए तैयार नही हुई। क्युकी कई बाते ऐसी होती हैं जो आप अपने माता पिता से उस समय पर नही बता सकते।
कई बार जब अँधेरा हो जाता था तो बड़ा डर लगता था एक बार की बात है ग्यारहवीं तक तो मेरे साथ कुछ और सीनियर्स भी जाती थी पर जब मै अन्तर में आयी तब अकेली ही रह गयी क्युकी वो सब अन्तर पास कर चुकी थी और इस बार मेरी किसी भी जूनियर ने एडमिशन नहीं लिया था ग्यारहवीं क्लास में। फिर भी मैंने दो तीन लड़कियां ढूंढी थी अपनी क्लास में जो आस पास के गाँव से आती थी। उनसे मेरी दोस्ती हो गयी थी फिर भी चुकी उस समय फ़ोन्स नहीं थे तो हम लैंडलाइन पर बात तो कर लेते थे पर कई बार या तो बस मिस हो गयी या वो लोग लेट हो गयी कुछ न कुछ हो ही जाता था। फिर भी हम साथ ही आने जाने की कोशिश करते थे। एक बार हमारा बायोलॉजी का प्रैक्टिकल था, बात है जनवरी माह की जो प्रैक्टिकल सुबह 9 बजे से शुरू होना था वो शुरू ही हुआ 1 बजे से क्युकी जिन टीचर्स`को हमारे यहाँ मुज़फ्फ़रनगर से आना था वो आए ही देर से फिर हमारा डिसेक्शन हुआ, फाइल चेक हुई और अंत में वायवा।
हमें स्कूल से निकलने में ही 6 बज गए।बस अड्डा पोहचने में आधा घंटा लग गया और अंधेरा हो गया वहाँ पोहचकर हम तीनो इंतज़ार करते रहे बस आने का। ठण्ड भी बढ़ती जा रही थी कई बस निकल गयी जो की पूरी भरी हुई थी इधर हम डरने लगे क्युकी इतना अँधेरा घर पोहचने में हमे पहले कभी नहीं हुआ था। आस पास कोई पीसीओ भी नहीं था घर पर फ़ोन ही कर लेते।सामने एक बस आकर रुकी और हम तीनो हिम्मत करके उस में चढ़ गए काफी भीड़ थी। जब बस चल दी तब हमे महसूस हुआ की हमने गलत बस पकड़ ली है क्युकी ये एक बारात की बस थी और उसमे केवल आदमी थे और ज्यादातर सभी नशे में थे।अब क्या किया जाये हम तीनो ने एक दूसरे का हाथ पकड़ लिया और दरवाजे से बिलकुल सत्कार खड़े हो गए। एक व्यक्ति ने हमे बोला भी की बीटा आप ऊपर सीट पर बैठ जाओ पर हमने ये कहकर मना कर दिया की अंकल हमे तो बस यहीं आगे ही उतरना है। पर ये तो हमारा मन ही जान रहा था उस दिन की हमने कितने भगवान को याद किया होगा उस आधे घंटे के रस्ते पर। पर हमने ये सोचा था की कुछ भी बात होगी तो हम बस से कूद जायेंगे। अँधेरा बढ़ता ही जा रहा था और हमे घबराहट भी हो रही थी की घर पर भी सब परेशान हो रहे होंगे। किसी तरह से हम मीरापुर पोहोच गए। उस दिन हमने एक बात और सीखी थी वो ये थी की बहार ठण्ड कितनी भी ज्यादा हो खासकर तब जब आप जनवरी के महीने में चलती बस में खुली खिड़की के सामने खड़े होकर ठिठुरन भरी ठण्ड में भीआप डर से पसीने भीगे सकते हैं मतलब आपका डर कितनी भी ठण्ड पर हावी हो सकता है।
जैसे ही हम मीरपुर में एंटर हुए हमने बस वहीँ रुकवा ली हालांकि लाइट भी नहीं थी और अंधेर अभी था इसलिए कुछ समझ नहीं आ रहा था की कहाँ जाएँ और क्या करें। ये जगह तो मैंने भी पहली बार देखी थी थोड़ी दूरी पर उनके पापा खड़े थे और वो उन्हें ले गए अब बची मैं अकेले और मेरे पास पैसे भी नहीं थे क्युकी बस वाले ने हमसे ज्यादा पैसे लिए थे तो हमारे पैसे भी ख़त्म हो गए थे फिर भी मुझे एक रिक्शा वाला दिखा मैंने उसे अपने चौक का नाम बताते हुए पूछा चलोगे तो वो बोलै की ठीक है पर पैसे ज्यादा लगेंगे में बोली है ठीक है घर पोहोच के दे दूंगी। मै चल दी एक छोटे से कसबे में कितनी गलिया, मोड़ और चौराहे हो सकते हैं ये मुझे उस दिन समझ में आया था और मन में बस राम का नाम ही चल रह था। बस आज किसी तरह से अपने घर सुरक्षित पोहोच जाऊ भगवान प्लीज मेरी विनती सुन लेना। खैर कुछ देर बाद मुझे अपना वाला रास्ता दिखायी दिया और में सब जगह पहचान गयी। घर पोह्ची तो दोनों छोटे भाई बहन मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे और कॉलोनी के कुछ अंकल बहार खड़े थे और ऑन्टी घर पर थी। मैंने पूछा मम्मी कहाँ हैं तो बहन बोली की तुम्हे ढूंढ़ने बस स्टैंड गयी हैं। पापा वहां नहीं थे वो तब तक सीतापुर हरगांव चीनी मिल में जा चुके थे ज्वाइन करने के लिए। मम्मी मेरे आने के कुछ मिनटों बाद ही आ गयी और उन्हें देखकर मुझे उस दिन जितनी ख़ुशी हुई की में शब्दों में बयां नहीं कर सकती। पानी पिया और मम्मी को बताया की प्रैक्टिकल लेट हो गया था जिसकी वजह से बस नहीं मिली तो हम सब लेट हो गए। बस पूरी बात नहीं बताई क्युकी अगले प्रैक्टिकल की तैयारी भी तो करनी थी।
उस रात क्या अगली कई रातों तक मुझे नींद नहीं आयी थी। आज भी मुझे ये वाक्य याद आता है तो डर लगने लगता है की उस दिन क्या कुछ हो सकता था हमारे साथ। खैर अंत भला तो सब भला
एक तो अब से 20-22 साल पहले मेरे माता पिता ने मुझे सबके विरुद्ध जाकर घर से दूर केवल इसलिये पढ़ने भेजा की मुझे विज्ञान विषय पढ़ना था यही मेरे लिए बोहोत बड़ी बात थी। उस पर अगर मैं उन्हे रोज़ आने जाने के दौरान आने वाली मुश्किलों के बारे में भी बताती तो वो कहते तो कुछ नहीना ही मेरी पढ़ाई बंद करवाते बस डरे रहते और चिंतित रहते मुझे और मेरी सुरक्षा को लेकर।
मैं नही चाहती थी की इस बार भी वही मुशकिले वही चैलेंज मेरे सामने आये तो मेने अपनी बात रखी और अन्ततः फैसला हुआ कि इस बार मैं हॉस्टल मे रहकर पढ़ाई करूँगी। और ये मेरे लिये बोहोत बोहोत बड़ी बात थी। क्युकी मेरा हॉस्टल मे जाने का सपना पूरा हो रहा रहा था।मैं बोहोत ज्यादा खुश थी ।

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