Transfer se darna kaisa- Enjoy Your Transfers
३१ मार्च को रात को ट्रांसफर की लिस्ट आई। कई दिन के इंतज़ार के बाद के बाद आखिरकार अच्छा लगा, ख़ुशी हुई, ख़ुशी बदलाव की खुशी। हाँ क्युकी में बदलाव चाह ही रही थी अपनी पुरानी जगह से, मुझे कुछ परेशानी हो रही थी मानसिक तौर पर। या ये भी कह सकते है कि मुझे इस बदलाव की आदत है, में ज्यादा दिन एक जगह नहीं रह सकती ,थोड़ा अजीब है न? पर है क्या करे।मुझे आदत है इसकी।
जब में छोटी थी सातवीं क्लास तक तो मै सिम्भावली में पढ़ी फिर 8 वी क्लास बहराइच से की ,9 वी और 10 वी चंदौसी जिला मुरादाबाद से किया बल्कि 10 वी भी बीच में ही थी कि हम मीरापुर आ गए क्युकी पापा वह से छोड़कर यहाँ आ गए थे। टिकौला चीनी मिल्स में तो मैंने वापस जाकर अपनी सहेली के घर रहकर पेपर दिए थे इस तरह से मैंने अपना पहला बोर्ड दिया, फिर 11th और 12th जानसठ जिला मुज्जफरनगर से किया क्युकी मीरापुर में लड़कियों के लिए साइंस के सब्जेक्ट्स नहीं थे किसी भी स्कूल में तो मुझे जानसठ एडमिशन लेना पड़ा क्युकी मेरे सब्जेक्ट्स फिजिक्स,केमिस्ट्री और बायोलॉजी थे। मैं रोज अप डाउन करती थी जो की घर से काफी दूर पड़ता था।
इसके बाद पापा हरगाँव जिला सीतापुर आ गए और में फाइनली लखनऊ चली गयी, इसके बाद से में अप डाउन भी नहीं कर सकती थी क्युकी काफी परेशानी होती है अप डाउन करने में तो में लखनऊ आ गयी बाकि की पढाई करने के लिए। लखनऊ में मैं ९ साल रही पूरे 2002 जुलाई में मैंने बीएससी में अड्मिशन लिया था और जुलाई 2002 में ही में वह से वापस आयी।वो भी शादी तय हो जाने के बाद, फिर शादी भी घर से काफी दूर हुई थी तो अक्सर जगह बदलती रहती थी। इसलिए मुझ ज्यादा परेशानी नहीं होती है जगह बदलने से, मुझ इतना ज्यादा फर्क नहीं पड़ता पुरानी जगह छोड़ने से और नयी जगह जाने से।
पर हाँ मुझे होशंगाबाद छोड़ते हुए दुःख हुआ था क्युकी वहा का माहौल काफी अलग था और हमारी विदाई भी यादगार रही थी बाकि सभी जगहों से। रीवा में कुछ अच्छा रहा तो काफी कुछ बुरा भी रहा इसलिए आखिर में तो मेरा मन ही उचट गया वहाँ से और लग रहा था कब जाये यहाँ से, रीवा में आते ही मेरी प्रेग्नेंसी के बारे में पता चला था जोकि एक जबरदस्त गुड़ न्यूज़ थी और में बोहोत एक्साइटेड थी इसको लेकर हालाकि मेरी तबियत उतनी अच्छी नहीं रही पर फिर भी अच्छा तो अच्छा ही है। और जब मेरा बेटा मेरी गोदी में आया तो सब ठीक हो गया। दिसंबर में मेरा बेटा पैदा हुआ और मार्च से कोरोना आ गया और लॉकडॉउन लग गया। 7 महीने का ही था मेरा बेटा जब मेरे भाई जो की मुझसे छोटा था और आर्मी में था ड्यूटी करते हुए शहीद हो गया। दुखो का पहाड़ टूट पड़ा हमारे परिवार के ऊपर और मेरा तो दुःख की सीमा ही नही थी क्युकी मेरे बेटे को उसने गोदी में भी नही खिलाया था में उससे 16 महीनो से मिली ही नहीं थी, अपने मातापिता की स्थति तो में बता ही नहीं सकती, मन तो मेरा तभी उचाट हो गया था वो कहते हैं न की शांति आप कहीं भी ढूंढो अगर अपने अंदर ही नहीं तो कही नहीं मिलेगी। समय कट ही रहा था जैसे तैसे की तभी दिवालीके तुरंत बाद मेरी सास की तबियत के बारे में पता चला टेस्ट कराये तो पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर हुआ है और वो भी लास्ट स्टेज का। हम उन्हें अपने साथ लेकर आ गए कुछ महीने उनकी सेवा करने के बाद वो हमे छोड़कर चली गयी ये सब भी रीवा में ही हुआ।
स्थानांतरण एक प्रक्रिया है एक बदलाव है जो कि जरुरी भी है नौकरी के साथ। ताकि आप एक ही जगह ज्यादा लोगो से खासकर लोकल लोगों से ज्यादा घुल मिल ना जाये।इससे आपके काम करने के तरीके पर पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
इसके बाद से तो मन ही नहीं लग रहा था तो अंततः जब लिस्ट आयी तो ख़ुशी ज्यादा हुई की हम जा रहे है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा की कहा जा रहे है। मैंने देखा है लोग बोहोत परेशान हो जाते है ट्रांसफर को लेकर। देखिये जब आप इस नौकरी में आए हैं तो दिमागी तौर पर तैयार रहिये की है हमे जाना है। हा मानती हूँ कुछ परेशानी जरूर होती है नयी जगह जाके लेकिन वो सिर्फ कुछ ही दिनों की होती है उसके कुछ महीनो बाद तो ज़िन्दगी वापस पटरी पर दौड़ने लगती है। तो एन्जॉय करिये परेशानियों को दरकिनार करके खुश रहिये और जहाँ भी रहें खुश रहे।



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