माता देती है नारी को शक्ति- navratre ki jankari
बस इसी तरह सांझी माता को घी बूरा का भोग लगाकर ये मानते है माता हर साल आती रहे इसी तरह से खुशियां लेकर खुशहाली लेकर। सारी कॉलोनी की छोटी छोटी लड़कियां घर घर जाकर रोज शाम को माता की आरती करती है और भजन गाती हैं उसके बदले सभी घरों के लोग उन्हें रोज कुछ पैसे देते हैं ऐसा रोज होता है पूरे नौ दिन तक, और फिर दसवे दिन, दिन में दशमी पूज कर शाम के समय भोग लगाकर लेकर जाते हैं और विसर्जित कर देते है ये मानकर की माता अगले साल फिर आएंगी हमे अपना आशीर्वाद देने।
खैर अब धीरे धीरे ये परम्पराएँ कहीं विलुप्त होती जा रही हैं। नए नए रूप में अलग अलग तरीके से पूजन होने लगा है सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ काम कुछ ज्यादा करके माँ को मना ही लेते हैं। माता दुर्गा के नौ रूप जिस तरह से अलग अलग सीख देते हैं उससे यही सीखने को मिलता है की नारी के भी अलग अलग रूप होते है वो एक ही समय पर कन्या, बेटी, पत्नी, बहु, माँ, सास, पड़ोसन , सहेली, कितने रूपों में होती है, पर इतनी शक्ति आती कहा से है?
क्या आपको पता है भगवन राम ने भी रावण वध से पहले माता की पूजा की थी। नौ दिन तक पूजन करने के बाद दसवे दिन ही रावण वध संभव हो सका था। वैसे हो भी क्यों ना राम नाम ही सीता के बिना अधूरा है, श्याम का नाम भी राधा के बिना अधूरा है, शिव शक्ति का एक और रूप जिसे पूरा जग पूजता है वो है अर्ध नारीश्वर रूप जो की स्पष्ट रूप से से पति और पत्नी रिश्ते को दिखाता है साथ ही ये भी दर्शाता है की शक्ति के बिन शिव अधूरे और शिव के बिना शक्ति।
मतलब की नारी के बिना पुरुष शक्तिहीन है और और पुरुष के बिना नारी।दोनों एक दूसरे की शक्ति होने साथ साथ एक दूसरे की प्रेरणा भी है। सुख दुःख के साथी।ऐसा ही होता है यही सच भी है कि पृथ्वी पर संतुलन बनाये रखने के लिये शिव और शक्ति दोनों जरुरी हैं।
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