Shadi Ek Pavitra Bandhan Hai(Bhag -2)- shadi ke mayne

 नमस्कार दोस्तों 

Shadi Ek Pavitra Bandhan Hai(Bhag -2)- shadi ke mayne


                  इस ब्लॉग के पहले भाग में हमने चर्चा की थी की आजकल इतने परिवार क्यों टूट रहे है? दहेज़, मारपीट शारीरिक शोषण के अलावा( चूँकि मुझे लगता है अलग होने के अलावा इन कारणों का कोई विकल्प होना भी नहीं चाहिए बल्कि पुलिस में रिपोर्ट लिखवाकर सजा दिलानी चाहिए ऐसे लोगो को तो) आज गौर करते है अन्य  कारणों, गलती और ज़िम्मेदारी के बारे में -

कारण - दोस्तों आज के समय में घर टूटने के कई कारण हैं।अब लड़कियाँ पहले से ज्यादा समझदार हो गयी है, जिन अत्याचारों को वो पहले ज़माने में चुपचाप घर में रहकर बिना किसी को बताये सहती रहती थी की कहीं किसी को पता चल गया तो उसी की गलती निकालेंगे, लोग क्या कहेंगे , कहीं मम्मी पापा तक बात पोहोच गयी तो क्या होगा, पडोसी क्या सोचेंगे? तो लड़कियां बंद घरों में चुपचाप बिना किसी को बताये सालोसाल किसी भी तरह के जुल्म सहती रहती थी। यहाँ तक की बुढ़ापे तक भी वो किसी को बता ही नहीं पाती थी, और फिर ये जुल्म आगे तक भी चलते रहते थे जैसे कि उनकी बहू पर भी जुल्म होते थे कारण था की बेटे ने भी वह सब देखा था अपनी माँ को हमेशा जुल्म सहते हुए तो उसे लगता था की ये नार्मल है ऐसा ही होता आया है और महिलाओं को ऐसे ही रखा जाता है, क्युकी उन पर हावी थी पुरुषवादी सोच की मानसिकता।फिर सास भी अपने ऊपर हुए जुल्मों का बदला लेने के लिए कुंठित दिमाग से अपने बेटे द्वारा बहु पर ज्यादा अत्याचार करवाती थी, और बात एक बार फिर वहीँ दब कर रह जाती थी यानि उसी घर की चारदीवारी में।   

                                     उस समय महिलाएं किसी भी तरह का कदम उठाने में हिचकिचाती थी की उनका पालन पोषण कैसे होगा अगर माता पिता ने भी नही रखा तो।क्युकी पहले के समय में माता पिता लड़की को विदाई के वक़्त ही ये समझा देते थे की अब तुम्हारा ससुराल ही तुम्हार लिए सब कुछ है, तुम्हारा पति तुम्हारा देवता है और उसकी कही हर बात तुम्हे माननी होगी, अब ससुराल से तुम्हारी अर्थी ही निकलेगी। अरे भाई इतना दबाव पहले ही बना दिया जाता था की वो बेचारी महिला डर के मारे आत्महत्या तो कर लेती थी पर माँ बाप तक बात नहीं पौहचाती थी। पर अब ऐसा नहीं है अब लड़कियां पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर हो गयी हैं। अपने अच्छे बुरे फैसले लेने में पूर्णतया समर्थ हैं। अब वो पैसे के लिए किसी पर भी निर्भर नहीं हैं। वो आगे आकर अपने फैसले लेने में सक्षम हैं।  बेटे भी अब माता पिता की हाँ में हाँ मिलाने से बचते हैं , वो केवल कठपुतली नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें भी सही और गलत का अंतर पहले से बेहतर समझ में आने लगा है। उन्हें अपने जीवन साथी से जुडी समस्याएं पता होती हैं और वक़्त रहते यदि वो उनका हल निकल लेते हैं तो ठीक है वरना कोरट कचहरी के चक्कर में तो कई बार ज़िन्दगी ही बर्बाद होके रह जाती हैं. 

गलती -  गलती सभी की है, बेटों की भी, बेटियों की भी, माता पिता की और सबसे ज्यादा समाज की। मैंने खुद ऐसे बोहोत से घर देखे हैं अपने आस पास, रिश्तेदारी में भी जानने वालो में की अपनी बेटियो को तो लोग विदेश में ब्याहते हैं या ऐसे लड़के से ब्याहते हैं जहाँ लड़का अपने माता पिता से अलग रहकर नौकरी करता हो, जबकि बेटो को हमेशा अपने पास ही रखते हैं, ताकि वो उन्हें छोड़ कर ना जाये।उन्हें ज्यादा पढ़ाते भी नही हैं और अगर कहीं पढ़ लिख जाये तो उन् पर दबाव बनाते हैं की वो उनके आस पास ही नौकरी करे ताकि वो अपने माता पिता के कहे अनुसार ही अपना घर चलाये।

लड़कों की शादी करते समय भी उनसे पूछा नहीं जाता उनकी मर्ज़ी भी नहीं पूछी जाती या कई बार लड़के लड़की बाहर किसी और को पसंद करते हैं और फिर भी उनकी शादी ज़बरदस्ती कहीं और कर दी जाती है। 

 कई बार लड़को या लड़कियों को कोई बुरी लत होती है उससे छुटकारा दिलाने के लिए माँ बाप किसी अच्छे डॉक्टर को दिखने की बजाय उसकी शादी कारण बेहतर मानते हैं और सोचते हैं की शादी के बाद हमारा बच्चा सुधर जायेगा और वो बिलकुल शरीफ बन जायेगा जबकि ऐसा केवल माता पिता की सोच में ही होता है असल ज़िन्दगी में जो काम डॉक्टर भी नहीं कर पते वो भला दूसरे घर की नयी लड़की कैसे कर पायेगी बल्कि वो खुद उस ख़राब सोच का शिकार हो जाती है और उसके पास अलग होने के अलावा कोई और विकल्प बचता ही नहीं है। 


    


To Be Continued....



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