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आगे बढ़ना जरुरी है पर अपनो के साथ

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 कितनी ही बार हम सफलता के पीछे भाग भागकर इतने असफल हो जाते हैं कि हमें खुद पता नही चलता की क्या पाने के लिए घर से निकले थे और क्या क्या खोकर लौटें हैं। ऐसा होता है और सच भी है। आगे बढ़ना कई बार हमारी मजबूरी से ज्यादा जरुरत बन जाता है और हम सफलता के पीछे भागते रहते हैं बिना पीछे मुड़कर देखे हुए या ये सोचते हुए कि कोई बोहोत अपना कोई खास मित्र कहीं चाय की दुकान पर खड़ा आज भी मेरा इंतज़ार कर रहा होगा और मुझे घर जाने से पहले उससे मिलकर उसके साथ मन ना होते हुए भी एक ग्लास चाय पीकर तो जाना ही है।               सफल होने की दौड़ में जिस तरह से असफलताएँ पीछे छूट जाती है ठीक इसी प्रकार और भी बोहोत कुछ पीछे छूट जाता है। नये साथी मिलते हैं तो पुराने दोस्त छूट जाते हैं, नयी गाड़ी मिलती है तो पुरानी जान से भी ज्यादा जिसकी रक्षा करते थे, जिस पर गर्लफ्रेंड को बिठाकर शान से घूमते थे वो बाईक कहिं पीछे बोहोत पीछे छूट जाती है। बाॅस मिलते हैं तो माँ बाप पीछे छूट जाते हैं।              हमारी वो सुकून की नींद जो स्कूल जाने से पहले आती थी या ...

हॉस्टल की यादें अच्छी कुछ बुरी-

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  मैं जब फ़र्स्ट डे हॉस्टल गई थी तो वो दिन काफी उदास था। हालाँकि ये मेरा सपना सच होने जैसा था क्युकी मैं हमेशा से सोचती थी कि मुझे हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करनी है, जो की वही दिन था, फिर भी मन उदास था। ये एक प्राइवेट हॉस्टल था क्युकी मेरे कॉलेज में हॉस्टल नही था। लखनऊ यूनिवर्सिटी के अंडर आता है इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज, वही से मेने बी ए सी (स्नातक) की है। कॉलेज के पास ही थोड़ी सी दूर बस वाकिंग दूरी पर ही हॉस्टल था मेरा।एक खूबसूरत सा घर नीचे आंटी यानी हमारी वॉर्डन रहती थी अपनी फेमिली के साथ और फर्स्ट फ्लोर पर हॉस्टल खोला था शुरुआत में। हालाँकि मेरे आने तक ऊपर दो फ्लोर और चालू हो गये थे और फुल भी थे।         मेरा मन नही लग रहा था जब पापा छोड़ कर जा रहे थे तो मन खराब हो रहा था। जबकि ऐसा नही था कि मैं पहली बार घर से निकली थी,आप कितना भी तजुर्बा रखते हों, कितने भी बड़े हो जाएँ पर अपने माता पिता का आपको छोड़ के जाना कभी भी खुशी नही दे सकता। मेरे अलावा उस दिन एक लड़की और थी हॉस्टल मे वो मुझसे शायद 2-3 दिन पहले आई थी। वो किसी और कॉलेज की थी और फ़ार्मेसी कर रही थी उसे भी घर की या...

महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की धुरी है- Shivani Deshwal

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महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की समान धुरी हैं। दोनो एक दूसरे के पूरक हैं, सबसे घनिष्ट मित्र भी और सबसे बेहतरीन और सच्चे साथी भी। जब हमारा जन्म ही एक दूसरे के लिये,एक दूसरे के साथ रहने के लिए हुआ है तो फिर हम रह क्यूँ नही पा रहे? क्या है जो हमें साथ रहने से रोकता है? क्या है जो हमें साथ आगे बढ़ने से रोकता है? हमारा अहं।           अगर अगर आप पति पत्नि हैं तो साथ गृहस्थी नही चला पा रहे, जल्दी ही तलाक ले लेते हैं या आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं और अब तो ये भी विचार नही रहा कि आपकी शादी को कितने साल हुए हैं? बच्चे हैं ? हैं तो कितने बड़े हैं? और कहिं आप गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड हैं मतलब शादी से पहले प्यार में हैं तो भी जल्दी ही अलग हो जाते हैं मतलब ब्रेकअप हो जाता है?   और कहीं लिव इन रिलेशनशिप मे हैं तो भी एक दूसरे को छोड़ कर कही और चले जाते हैं।बात तो थोड़ी अजीब है यहाँ तक के विचार करने योग्य है। पर ऐसा है क्यूँ? क्या हम जल्दी ही बोर हो जाते हैं इसलिए बदलाव महसूस करतें हैं या फिर हमें हमारे रिश्तों की कद्र नही रही या फिर जल्दी जल्दी बड़े होने और पैसे कमाने के चक्क...

एक घटना जिसने मुझे सीख दी- Shivani Deshwal

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बात सन 2002की है। मेरा इंटर का परिणाम आया और जाहिर सी बात है कि घर में चर्चा शुरु हो गई आगे की पढ़ाई को लेकर।कई लोगों से पूछ ताछ करने के बाद तय हुआ कि मैं स्नातक करूंगी पर कहाँ से? ये एक बड़ा प्रश्न था क्युकी पापा उस समय सीतापुर जिले के हरगाँव चीनी मिल्स में कार्यरत थे जो कि सीतापुर और लखीमपुर के बीच पड़ती थी तो निर्णय हुआ कि इन्ही मे से कहीं दाखिला लिया जाये।सब को ठीक ही लगा पर मुझे अच्छा नही लगा क्युकी मे इस से पहले यानी इंटर मे भी रोज़ अप डाउन कर चुकी थी जो कि थोड़ा मुश्किल भरा होता है।         ये वो चीजें होती हैं जिनसे आप रोज़ नया सीखते तो है पर कई बार कुछ मुश्किलें भी सामने आती हैं। अब अप देखिए कल आपका एक ही विषय पढ़ाया जायेगा, ये बात पहले से जानते हुए भी हमें जाना पड़ता ही था इतनी दूर। सारा दिन इसी में निकल जाता था। कई बार तो शाम हो जाती थी खासकर सर्दियों के दिनो में जब दिन छोटे होते हैं। घर आकर फिर सुबह जाने की तैयारी। इस बार मैं रोज़ आने जाने के लिए तैयार नही हुई। क्युकी कई बाते ऐसी होती हैं जो आप अपने माता पिता से उस समय पर नही बता सकते।       ...

जो अपने मन का हो तो अच्छा- शिवानी देशवाल

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 Hum apne din ki shuruat bhale hi roj ek se tarike se karte hai ya ek hi routine se karte hain par ye jaruri to nahi ki din dhalte dhalte ya ghani raat hone tak wo ek sa hi rahe. Balke iski jabardast sambhavnaye hoti hain ki hmara aj ka din kal se kuch kam ya jyada hi beetega.          मुझे लगता है कि ऐसा ज्यादतर सभी के साथ होता ही होगा। सुबह आप उठे सब ठीक-ठाक रहा अच्छी शुरुआत की दिन की।पानी पिया,नाश्ता किया ,नहाए या और जो भी रोजमर्रा के काम हैं सब निपटाकर आप बैठे ही थे की अचानक कोई फोन आ गया या आपको कहिं जाना पड़ गया और फिर दिन ऐसे बीता की रात होने तक अपने खुद का और वक़्त का कोई होश ही नही रहा।          जैसे एक बार मुझे डॉक्टर ने कुछ टेस्ट करवाने को बोले थे तो मुझे लगा सब नॉर्मल ही होंगे। हम पोहोच गये अगले दिन सुबह टेस्ट करवाने एक डॉक्टर के पास।उन्होने अपने तरीके से कुछ देखा और फिर भेज दिया एक दूसरी जगह किसी और लैब में। इन सब दौड़भाग में लगभग आधा दिन तो निकल ही गया था हमारा भूख लगी लगने लगी सो अलग। पर अब चूँकि टेंशन भी हो गई थी कि ये ...

कुछ बाते अनकहीं सी- Shivani Deshwal

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 मैने कितनी ही बार अपनी जिन्दगी मे पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की है आज यहाँ आने के बाद भी। चूँकि आप अपने अतीत अपने पास्ट को पलटकर नही देखेंगे तो कभी अन्दाजा ही नही लगा पायेंगे कि हमने खोया क्या है और पाया क्या है? तो जब मे खुद को देखती हूँ आज से दस साल,बीस साल या तीस साल पीछे पलटकर तो काफी कुछ कहा अनकहा है,कई पुरानी यादें हैं जो कुछ पीछे छूट गई। बुरे पल भी रहें हैं अच्छे भी रहें हैं।         जैसे शादी के बाद जिन्दगी अलग सिरे से चली और शादी से पहले काफी अलग सिरे से थी। पहले आप मम्मी पापा के साथ रहते हैं उनकी बात मानते है उनकी बतायी बाते उनके विचार सुनते हैं और आप आगे बढ़ते रहते हैं सब सीखते हुए। कब बचपन निकल जाता है आपको पता भी नही चलता और फिर भी आप आगे बढ़ते रहते हैं नई चीजें सीखते हुए। सब अच्छा ही चल रहा होता है क्युकी आप अपना दिमाग इस्तेमाल नही करते पर जैसे ही आप अपनी चारदिवारी अपने घर से बाहर निकलते हैं आप काफी कुछ नया सोचने लगते हैं।सीखने लगते हैं। या यूँ कहिये की जिन्दगी सिखा ही देती है।        सीखना हमारे जीन मे है, हमारे खून में है यहाँ त...

बातचीत ही दूरियाँ मिटाने का आसान रस्ता है- शिवानी देशवाल

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 Namaskar dosto Meine aksar gaur kiya hai ki hmari roj Kitni hi baate ankahi reh jati hai. Hum kisi ko btana chahte hai ki hum uske bare mei kya sochte hai ya hum usse kitna pyar karte hai ya hum usse kyu naraz hai par keh nhi pate. Reason? Reason ye hai ki hum jo kehna chahte hai wo samne wala sunne ko bhi to tayyar ho. Rishton ko bnana to asan hota hai par unko maintain karna bohot mushkil hai. Samne wale ko apni feelings btana kai baar rishton par bhari pad jata hai aur tajjub to tab hota hai jab apke apne mata pita ya bhai behen hi kai baar apko samajh nhi pate jo ki humse mann se bhi jude hote hai aur blood se bhi. Aur hmesha se hi hmare sath rahe hai. Jab apno ke sath hi aisi situations aa jati hain to bahar ke rishton ko to waise hi badnam kiya hua hai duniya ne. Warna asliyat to apko aaina apne hi dikha dete hain.          Mera manna hai ki jis tarah ghar bnane mei efforts lgte hai waise hi rishton ko bnane mei bhi lgne chahiye aur wo bhi dono taraf...