महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की धुरी है- Shivani Deshwal

महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की समान धुरी हैं। दोनो एक दूसरे के पूरक हैं, सबसे घनिष्ट मित्र भी और सबसे बेहतरीन और सच्चे साथी भी। जब हमारा जन्म ही एक दूसरे के लिये,एक दूसरे के साथ रहने के लिए हुआ है तो फिर हम रह क्यूँ नही पा रहे? क्या है जो हमें साथ रहने से रोकता है? क्या है जो हमें साथ आगे बढ़ने से रोकता है? हमारा अहं।

          अगर अगर आप पति पत्नि हैं तो साथ गृहस्थी नही चला पा रहे, जल्दी ही तलाक ले लेते हैं या आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं और अब तो ये भी विचार नही रहा कि आपकी शादी को कितने साल हुए हैं? बच्चे हैं ? हैं तो कितने बड़े हैं? और कहिं आप गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड हैं मतलब शादी से पहले प्यार में हैं तो भी जल्दी ही अलग हो जाते हैं मतलब ब्रेकअप हो जाता है?  

और कहीं लिव इन रिलेशनशिप मे हैं तो भी एक दूसरे को छोड़ कर कही और चले जाते हैं।बात तो थोड़ी अजीब है यहाँ तक के विचार करने योग्य है। पर ऐसा है क्यूँ? क्या हम जल्दी ही बोर हो जाते हैं इसलिए बदलाव महसूस करतें हैं या फिर हमें हमारे रिश्तों की कद्र नही रही या फिर जल्दी जल्दी बड़े होने और पैसे कमाने के चक्कर मे रिश्तों को निभाने की सीख लेना ही भूल गए। 

        जिनके माता पिता अलग-अलग रहते हैं या उन बच्चों को जिन्होने अपने घरों मे तलाक देखा है वो रिश्तों से भागने की बजाय ये क्यूँ नही सोचते की मुझे इनके जैसा नही बनना। और अपने खुद के नये रिश्ते बनाने भी है और उन्हे अच्छे से निभाकर दुनिया के सामने एक नई मिसाल कायम करनी है। पर नही हम भागने लगते हैं, गलत चीजों की तरफ दौड़ने लगते हैं। असल में हमे पता भी नही चलता कब हमारा दिमाग नेगेटिव चीजों की तरफ खिंचा चला जाता है। 

            असल में हम इन्सान हैं, हमे बोलना आता है सोचना आता है तो हम क्या करते हैं इन सब अच्छी चीजों का गलत इस्तेमाल करते हुए अपने फायदे और नुक्सान के हिसाब से सोचते हैं और उन्हे मोड़ लेते हैं। ऐसे ही हम जिंदगी और रिश्तों के साथ भी करते हैं।

मेरा मानना है कि हमारी सोच की बागडोर हमारे हाथ में होनी चाहिये। मेरे रिश्ते कोई और क्यूँ चलाए जबकि मैं खुद परिपक्व हूँ इन्हे बेहतरी से समझने के लिये भी और चलाने के लिये भी।  ऐसे ही पति पत्नि के रिश्ते मे भी होता है। घर का हर सदस्य सलाह देता है अब तुम ऐसे कर लो और बस यहीं से सब खराब होना शुरु हो जाता है। क्यूँ आप खुद निश्चय नही कर सकते कि अपनी पत्नि या पति के साथ आपको कैसे वक़्त बिताना है, कहाँ घूमने जाना है? कौन सा जरुरी समान खरीदना है। 

          कहने का मतलब सीधा सा है कि अपनी जिंदगी के अच्छे या बुरे जो भी फैसले हो पूरी तरह सोच समझ कर ही लें। किसी के दबाव में न लें ना ही किसी और के अनुभव के आधार पर ले। बल्कि खुद के अनुभव विकसित करें। और साथ ही कुछ देर के लिये अपने अहं को दरकिनार करके लिये गये फैसले से अपनी जिन्दगी में होने वाले फायदे और नुक्सान के बारे में भी जरुर सोचें। हम किसी को भी छोड़ने मे अपनी शान समझते होंगे पर किसी दिन हमें कोई छोड़ गया तो शायद कंधे पे सर रख के सहारा देने वाला भी कोई ना मिले।


महिला और पुरुष दोनो ही जीवन की धुरी है- Shivani Deshwal

मुझे किसी अपने को खो कर जिन्दगी की कीमत समझ आई

आप इंतज़ार मत कीजिये किसी अपने को खोने का "


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