हॉस्टल की यादें अच्छी कुछ बुरी-
मैं जब फ़र्स्ट डे हॉस्टल गई थी तो वो दिन काफी उदास था। हालाँकि ये मेरा सपना सच होने जैसा था क्युकी मैं हमेशा से सोचती थी कि मुझे हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करनी है, जो की वही दिन था, फिर भी मन उदास था। ये एक प्राइवेट हॉस्टल था क्युकी मेरे कॉलेज में हॉस्टल नही था। लखनऊ यूनिवर्सिटी
के अंडर आता है इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज, वही से मेने बी ए सी (स्नातक) की है। कॉलेज के पास ही थोड़ी सी दूर बस वाकिंग दूरी पर ही हॉस्टल था मेरा।एक खूबसूरत सा घर नीचे आंटी यानी हमारी वॉर्डन रहती थी अपनी फेमिली के साथ और फर्स्ट फ्लोर पर हॉस्टल खोला था शुरुआत में। हालाँकि मेरे आने तक ऊपर दो फ्लोर और चालू हो गये थे और फुल भी थे।
के अंडर आता है इरम गर्ल्स डिग्री कॉलेज, वही से मेने बी ए सी (स्नातक) की है। कॉलेज के पास ही थोड़ी सी दूर बस वाकिंग दूरी पर ही हॉस्टल था मेरा।एक खूबसूरत सा घर नीचे आंटी यानी हमारी वॉर्डन रहती थी अपनी फेमिली के साथ और फर्स्ट फ्लोर पर हॉस्टल खोला था शुरुआत में। हालाँकि मेरे आने तक ऊपर दो फ्लोर और चालू हो गये थे और फुल भी थे।
मेरा मन नही लग रहा था जब पापा छोड़ कर जा रहे थे तो मन खराब हो रहा था। जबकि ऐसा नही था कि मैं पहली बार घर से निकली थी,आप कितना भी तजुर्बा रखते हों, कितने भी बड़े हो जाएँ पर अपने माता पिता का आपको छोड़ के जाना कभी भी खुशी नही दे सकता। मेरे अलावा उस दिन एक लड़की और थी हॉस्टल मे वो मुझसे शायद 2-3 दिन पहले आई थी। वो किसी और कॉलेज की थी और फ़ार्मेसी कर रही थी उसे भी घर की याद आ रही थी।
पापा और आकाश मेरा छोटा भाई जो की सिर्फ दस या ग्यारह साल का रहा होगा उस वक़्त उसका आना पापा के साथ बोहोत बोहोत खुशी दे रहा था। अपने छोटे भाई से मै बोहोत ज्यादा लगाव रखती हूँ। मुझसे आठ साल छोटा था वो खासकर बोहोत मननतो का वैसे था वो, खैर ये कहानी कभी बाद मे।
फिर वो अक्सर आ जाता पापा के साथ अगर मैं राखी पर नही जा पाई कभी तो वो आ गया।वैसे मैं खुद भी कहाँ रुक पाती थी 15दिन या एक महिने में तो घर चली ही जाती। कॉलेज मे छुट्टियाँ भी काफी होती थी।पहले साल तो मैं बहाने ढूंढती थी घर भागने के फिर बाकी लडक़ीयों को देखकर समझ आया की जल्दी जल्दी घर जाने के अगर कुछ फायदे है तो कुछ नुक्सान भी हैं।वापस आने के बाद कई दिनों तक मन नही लगता। दिनचर्या जो इतने दिन तक बनाते हैं वो खराब हो जाती है और पढ़ाई पर सबसे ज्यादा असर होता है तो जाना कुछ कम हो गया था।हाँ हम अक्सर ऐसा करते थे या तो पापा आ जाते थे मिलने और कभी मैं चली जाती थी जब छुट्टी थोड़ी लम्बी होती थी तब।
हॉस्टल की अपनी एक अलग जिंदगी होती है,कभी कभी तो लगता है मानो ये अपने आप में एक पूरा शहर है पूरी एक आबादी है। साथ में खुशियाँ मनाना साथ में गाना साथ मे जन्मदिन मनाना।कई बार ग्रुप भी बन जाते हैं।वैसे मैं कभी किसी ग्रुप का हिस्सा नही रही। मुझे बाते इधर की उधर करना ननही आता था ना।मैं ठहरी स्पष्टवादी इन्सान तो कोई मुझे अपने ग्रुप में रखता ही नही था।
मुझे अक्सर झगड़े विवाद सुलझाने के लिये बुलाया जाता था। हमारी वॉर्डन आंटी बोहोत यकीन करती थी मुझ पर और मानती भी काफी थी। पापा को आने में अगर देर हो जाती तो पूछती और अपने पास बिठाती।अच्छा लगता था। वो दिन कभी लौट के नही आने वाले पर मेरी जिन्दगी का खूबसुरत हिस्सा हैं और यादे हैं इसलिये मुझे तसल्ली है की मेने वो वक़्त जिया।
धन्यवाद
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