क्या दुःख से निकलना इतना आसान है? -Shivani Deshwal




किसी को खो देने का दुख क्या होता है ये मुझसे पूछो मैने बोहोत करीब से इसे देखा है महसूस किया है। किसी बोहोत अपने को जो आपके दिल के बोहोत करीब हो और जिसकी आपने सपने में भी कल्पना ना की हो वही इन्सान अगर आपको हमेशा के लिए छोड़ कर चला जाए तो क्या होता है ये मुझसे बेहतर कौन बता सकता है।मेने तो इस दुख को जिया है बोहोत करीब से। मुझे समझना उन लोगों के लिये थोड़ा मुश्किल होगा जो समझना नही चाहते पर वो लोग आसानी से समझ जाएँगे जिन्होने मेरी तरह किसी भी अपने को हाल फिल्हाल खोया है।
               किसी के चले जाने मात्र से दुनिया नही रुकती यही प्रकृति का नियम है यही सच है। ये तो हम सब जानते ही हैं यहाँ तक के जब आप उन परिस्थतियों का सामना कर रहे होते हैं तब सभी ज्ञानी लोग हमे यही समझाते हैं इसी तरह पर हमारा मन सब जानते हुए भी उस दुख को सहने की शक्ति नही जुटा पाता। जुटाये भी कहाँ से ये दुख अचानक से इस तरह से हमारे ऊपर गिरते हैं की कितना ही समझदार इन्सान हो सब समझदारी धरी रह जाती है। जमीनी हकीकत यही है।कोई कुच भी कितना भी कहे पर मन तो मन है करेगा वही जो वो खुद चाहेगा और तभी बाहर निकलेगा जब चाहेगा।
               कई बार शायद हम जल्दी कर देते हैं चीजों को समझने में हमें वक़्त देना चाहिए खुद को और अपने आस पास को भी ताकि हम समझ तो सकें पहले कि ये हुआ क्या है।और जाहिर सी बात हम चीजों को स्वीकारेंगे तो तब जब,जब हम उन पर यकीन कर पायेंगे और यकीन करने में तो वक़्त लगता ही है।हाँ बस एक बात है ये वक़्त होगा कितना लंबा ये तय नही है।शायद 4दिन या 6महिने या फिर 5साल या शायद पूरी उम्र।
स्वीकार तो नही कर पाए पर इस दुख के साथ जीना सीख जाएँ।


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